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एक और नई बिमारी से देश में दहशत, निकालनी पड़ रही लोगों की आँखें.

आइबाल के विट्रस फ्लूड (द्रव्य) में भी ब्लैक फं’गस (म्यूकर माइकोसिस) मिला है। डेढ़ माह के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कालेज के नेत्र रोग विभाग में ऐसे दो केस मिले हैं। मेडिकल कालेज के विशेषज्ञों का दावा है कि विश्व में पहला केस दिल्ली में मिला था। यहां के दो केस मिलाकर विश्व में अब तक तीन केस ही सामने आए हैं।

मेडिकल कालेज के लाला लाजपत राय अस्पताल (हैलट) में ब्लैक फंगस के 53 मरीज अब तक भर्ती हुए हैं। उनमें से दो की आंख के विट्रस फ्लूड (द्रव्य) में म्यूकर माइकोसिस का संक्रमण मिला है। इससे डाक्टर भी हैरान हैं। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष व ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभागाध्यक्ष मिलकर इसपर अध्ययन कर रहे हैं, जिससे वजह पता लगाई जा सके।

विट्रस में बैक्टीरियल इंफेक्शन

नेत्र रोग विभागाध्यक्ष प्रो. परवेज खान के मुताबिक, विट्रस में बैक्टीरियल इंफेक्शन के केस तो आते हैं। पहली बार सबसे घातक म्यूकर माइकोसिस मिला है। अस्पताल में ब्लैक फंगस पीडि़त चार मरीजों की आंखें निकाली गईं हैं। इनकी आंखें खराब होने की वजह पता करने के लिए उन्होंने व ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. लुबना खान ने मिलकर अध्ययन शुरू किया। आंखों के आइबाल के विट्रस का फ्लूड लेकर साइटोलाजी लैब में स्लाइड तैयार कराई गई। फिर उसकी हिमोटोक्सिन एंड इओसिन (एच एंड ई) स्टेनिंग कराई। अच्छी तरह से स्टेनिंग होने के बाद माइक्रोस्कोपिक जांच में विट्रस के फ्लूड में म्यूकर माइकोसिस की हाइफी और स्पोर्स दोनों मिले।

बिगड़ने लगता आंख का आकार

जीएसवीएम मेडिकल कालेज में नेत्र रोग के विभागाध्यक्ष प्रो. परवेज खान कहते हैं कि अभी तक ब्लैक फंगस के जितने भी मरीज भर्ती हुए हैं, उनकी आंख के पिछले हिस्से में ही म्यूकर माइकोसिस का संक्रमण पाया गया है। दो केस ऐसे सामने आए हैं, जिसमें आइबाल विट्रस के फ्लूड में म्यूकर माइकोसिस पहुंच गया। आइबाल में भरा विट्रस फ्लूड आंख को आकार भी देता है। फंगस के संक्रमण से विट्रस में पस (मवाद) बनने से लीकेज होने लगता है, जिससे आंख का आकार बिगडऩे लगता है। रोशनी जाने के साथ आंख सडऩे लगती है।

तैयार किया जा रहा स्टडी पेपर

जीएसवीएम मेडिकल कालेज में ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. लुबना खान बताते हैं कि रेटिना और आंख के लेंस के बीच पारदर्शी जेली जैसा द्रव्य होता है, जिसे विट्रस कहते हैं। रेटिना और लेंस के बीच लाइट बिना रुकावट इस पारदर्शी द्रव्य के जरिए आती है, जिससे तस्वीर बनती है। इसमें किसी प्रकार की कोई कोशिका (सेल) या कुछ और नहीं होता है। विट्रस में फंगस मिलना बहुत ही आश्चर्य की बात है। इसका स्टडी पेपर तैयार किया जा रहा है, जो भविष्य में मेडिकल छात्रों की पढ़ाई में मददगार होगा।

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