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उनकी सारी कोशिशो पर फिर गया पानी

दक्षिणी पैं’गोंग में रे’जांग’ला से करीब एक किलोमीटर की दूर पर स्थित मुखपरी पहाड़ी पर ची”नी सै’नि’कों ने सोमवार की शाम घु”सपैठ करने की कोशिश की। यह रणनीति दृष्टि से बेहद अहम है। यदि इस चोटी पर ची”नी सेना काबिज हो जाती तो वह पैं’गोंग इलाके में भारतीय सै”निकों की तैनाती से लेकर आवाजाही तक पर नजर रख सकती थी, लेकिन सेना ने उसकी कोशिश को विफल करार दिया।

सेना के सूत्रों के अनुसार सोमवार को करीब छह-सात हजार चीनी सैनिक हथियारों के साथ-साथ रॉड, डंडों एवं अन्य नुकीले हथियारों से भी लैस थे। ऐसा प्रतीत होता है कि वे गलवान घाटी की घटना को दोहराना चाहते थे। गलवान घाटी में इसी प्रकार के हथियारों के हमले में 20 भारतीय जवान शहीद हुए थे, लेकिन उस घटना के बाद से सेना हर प्रकार की स्थितियों के लिए तैयार थी, इसलिए, चीनी सेना की कोशिश नाकाम हो गई।

भारतीय सेना ने हाल के दिनों में पैंगोंग इलाके में कई स्थानों पर अपनी तैनाती नए सिरे से की है। उसने रणनीतिक रूप से कई अहम चोटियों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। ऐसा करना इसलिए जरूरी था, क्योंकि चीनी सेना फिंगर-4 एवं फिंगर-5 की चोटियों पर डटी हुई थी, जबकि भारतीय सेना निचले इलाकों में थी। पिछले सप्ताह भारतीय सेना ने ब्लैक टॉप समेत कई चोटियों पर मोर्चा संभाला। इससे वह चीनी सेना से बेहतर पॉजीशन में आ गई। इतना ही नहीं भारतीय सेना ने मुखपरी पहाड़ी पर भी अपनी मौजूदगी कायम की है। चीन की तरफ से मुखपरी पहाड़ी का जिक्र शेनपाओ माउंटेन नाम से किया जा रहा है।

लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र सिंह (रि.) के अनुसार रेंजांगला के इलाके में इस क्षेत्र की तमाम चोटियां रणनीतिक रूप से अहम है। इन चोटियों से दोनों तरफ निगाह रखना संभव है। इसलिए जो काबिज होता है, वह बढ़त में होता है। मूलत: यह वह स्थान है जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है, लेकिन दोनों देशों की सेनाएं इस क्षेत्र में कभी-कभार गश्त करती हैं। इसी प्रकार फिंगर इलाके में चार से आठ तक जहां चीनी सेनाएं डटी हुई हैं, वह भी बिना किसी नियंत्रण वाले क्षेत्र थे जिन पर मई में आकर चीनी सेना बैठ गई।


सिंह ने बताया कि जब लगातार कई दौर की सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता के बाद भी चीन पैंगोंग इलाके से पीछे नहीं हटा तो पिछले सप्ताह भारतीय सेना ने आक्रामक रुख अपनाया और पैंगोंग इलाके में रणनीतिक रूप से अहम कई चोटियों में ऊंचे स्थानों पर पॉजीशन संभाल ली। इससे भारतीय सेना की स्थिति काफी बेहतर हो गई थी।


सिंह ने कहा कि सात सितंबर की घटना से साफ है कि चीन शेनपाओ चोटी पर काबिज होने के पक्ष में था। या तो उसे भारतीय सेना की मौजूदगी का अहसास नहीं था या उसे कड़ी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रही होगी। इसलिए उसे भारतीय सेना से मुंह की खानी पड़ी। चीन के लिए यह बड़ा सबक है। रेजांगला वही स्थान है जहां 1962 की लड़ाई में भारतीय सेना की मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी ने चीनी सैनिकों को सबक सिखाया था।


सिंह कहते हैं कि सैन्य कमांडर समेत कई वार्ताओं में तनाव दूर करने का कोई नतीजा नहीं निकला है। इसलिए राजनयिक स्तर पर इस मुद्दे को सुलझाने की जरूरत है। इसलिए बकायदा दोनों देशों को समझौता करना चाहिए और उसका एलएसी पर क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए।

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