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ढह गया एक और समाजवादी किला, कभी मुलायम का लहराता था परचम, अखिलेश यादव ने गौर किया या नहीं?

मित्रों वैसे तो आप लोगों को पता होगा कि आजादी के बाद भारत में कई सारी राजनीतिक पार्टियां जन्म ली है । जिसमे से कुछ ही पार्टियों को राष्ट्रीय राजनीतिक दल का दर्जा प्राप्त हुआ। पर वही कई ऐसी राजनीतिक पार्टियाँ है जो एक दूसरे पर हमेशा से बयान बाजी करती रहती है और किसी न किसी वजह से सुर्खियों में बने रहते है आज हम तीन दशक पुरानी समाजवादी पार्टी के बारे में बात करने वाले है उत्तर प्रदेश की सियासत में सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार सियासी चक्रव्यूह में घिरते जा रहे हैं. सपा से अलग हो चुके शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव से हिसाब-किताब बराबर ही नहीं बल्कि सपा के ‘यादव’ कोर वोटबैंक में सेंधमारी ‘यदुकुल मिशन’ शुरू किया है. बीजेपी की नजर पहले से ही यादवों पर है इन सारी कवायद के बीच अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा भी अब सपा के पकड़ से बाहर निकलती नजर आ रही है, जिससे अखिलेश यादव के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं लेकिन अखिलेश यादव की अगुवाई में समाजवादी पार्टी धीरे-धीरे कई मजबूत किले हारती जा रही है और विरोधियों के हौसले अब बुलंद हैं। इन तमाम चुनौतियों के बीच इसी महीने गुजरात से अखिलेश यादव के लिए बुरी खबर आई। इस खबर के बारे में विस्तार से जानने के लिए पोस्ट के अंत तक बने रहिये।

दरअसल राज्य भले ही दूसरा हो लेकिन ये खबर सपा के एक और किला ढहने की थी। ये वो किला था जो मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक जीवन का मजबूत स्तंभ माना जाता रहा। इस पर चढ़कर मुलायम ने यूपी ही नहीं देश की सियासत में अपना लोहा मनवाया। अब इसके ढहने को अब अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के भविष्य की सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है। ये किला और कोई नहीं अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा है। ये वो संगठन है, जो 12 साल बाद अपने 100 वर्ष पूरे कर लेगा। अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा की स्थापना वर्ष 1924 में की गई थी। इस महासभा पर हमेशा से यूपी के नेताओं का ही वर्चस्व रहा। कुल 46 अध्यक्षों में से अधिकतर यूपी से ही रहे। मुलायम सिंह यादव शुरुआत से ही इस महासभा से जुड़े रहे। 90 का दशक आते-आते मुलायम का महासभा में वर्चस्व कायम हो गया। चौधरी राम गोपाल, हरमोहन सिंह और उदय प्रताप सिंह तीनों ही सपा से जुड़े रहे और महासभा में अध्यक्ष रहे लेकिन 2017 में समय बदला और समाजवादी पार्टी की बागडोर अखिलेश यादव के हाथ आई, मुलायम अब सपा संरक्षक बन चुके थे। यही नहीं यादव परिवार में भी फूट पड़ चुकी थी। चाचा शिवपाल अलग राह पकड़ चुके हैं। देखते ही देखते चुनाव दर चुनाव सपा कमजोर होती गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने पूरी ताकत झोंकी लेकिन समाजवादी पार्टी प्रमुख विपक्षी दल ही बन पाई। इसके बाद लोकसभा उपचुनाव में आजमगढ़ की अखिलेश यादव अपनी ही छोड़ी गई सीट जिता न सके, रामपुर भी चला गया।

मिली जानकारी के मुताबिक एक तरफ सपा अपने कठिन दौर से गुजर रही है, वहीं दूसरी तरफ सियासी दलों ने भी अब यादव वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिशें शुरू कर दी हैं। इस महीने गुजरात से आई एक खबर ने सपा के लिए चिंता और बड़ी कर दी है। यहां पहली बार अखिल भारत वर्षीय यादव महासभा से समाजवादी पार्टी का वर्चस्व टूट गया है। अगस्त में पूर्व सांसद उदय प्रताप सिंह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 11 सितंबर को गुजरात के द्वारका में महासभा की कार्यकारिणी बैठक हुई। इसमें बंगाल के स्वप्निल कुमार घोष को महासभा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। वैसे स्वप्निल कुमार घोष पहले से ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पदाधिकारी थे। उन्हें एक माह पूर्व ही उदय के इस्तीफे के बाद कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था। हर चुनाव में बीजेपी ने यादव बेल्ट कहे जाने वाले मैनपुरी, इटावा, कन्नौज आदि जिलों में संगठन को मजबूती दी है। पार्टी में यादव नेताओं की नई पौध तैयार की गई है। सुभाष यदुवंश को विधान परिषद भेजा गया है, वहीं अखिलेश के गढ़ आजमगढ़ में सपा को लोकसभा उपचुनाव में मात भाजपा ने दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ की अगुवाई में दी।सबसे बड़ी खबर पिछले दिनों आई, जब सपा के पूर्व सांसद हरमाेहन सिंह यादव की पुण्यतिथि पर आयोजित गाेष्ठी में पीएम नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया। गौर करने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव के लिए चौधरी हरमोहन सिंह यादव और उनका पूरा परिवार खास रहा है। चौधरी हरिमोहन सिंह यादव सपा के संस्थापक सदस्यों में रहे। तीन बार एमएलसी और दो बार राज्यसभा सांसद रहे।

आपको बता दे कि यादव महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। हरमोहन सिंह के बेटे सुखराम 2004 से 2010 तक यूपी विधान परिषद में सभापति रहे। लेकिन समय के साथ ये परिवार सपा से दूर होता गया। इसी साल 2022 विधानसभा चुनाव से पहले उनके बेटे मोहित यादव भाजपा में शामिल हो गए। चुनाव के बाद सुखराम की पीएम मोदी और सीएम योगी से मुलाकात चर्चा बनी एक तरफ भाजपा और बसपा हैं, तो दूसरी तरफ अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव हैं। दोनों के बीच रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। शिवपाल अब अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को खड़ा करने की पूरी तैयारी में हैं और उनका भी पहला टार्गेट यादव वोट बैंक ही है। वर्षों तक मुलायम के साथ यादव महासभा से जुड़े रहे शिवपाल ने अब यूपी में यदुकुल पुनर्जागरण मिशन की शुरुआत की है। उनके साथ डीपी यादव खड़े हैं, जो मुलायम के करीबी माने जाते थे। शिवपाल का कहना है कि मिशन के जरिए यादवों के साथ अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को भी एकजुट कर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी जाएगी। दिलचस्प बात ये भी है कि बढ़ती उम्र को देखते हुए मुलायम सिंह यादव के 2024 में मैनपुरी से लोकसभा चुनाव लड़ने को लेकर संशय की स्थिति है और शिवपाल खेमे की तरफ से इस पर दावेदारी शुरू कर दी गई है। जाहिर है यादव वोट बैंक को सपा से जोड़े रखने के लिए अखिलेश के सामने चुनौतियां तेजी से खड़ी हो रही हैं। अब देखना ये होगा कि अखिलेश इन सभी चुनौतियों से कैसे निपटते हैं।

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