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अपनी गलती का एहसास होने पर माफी मांगने लगा श्री लं-का

चीन की विस्तारवादी नीति का एक अहम् हथियार है कर्ज का जाल. छोटे देशों को वो अपने कर्ज के जाल में इतना फांस लेता है कि वो देश कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता है. उसके बाद चीन उस देश के बंदरगाह या हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर लेता है. चीन की इस नीति का शिकार श्रीलंका हो चुका है और उसे अपना हंबनटोटा का बंदरगाह 99 साल की लीज पर चीन को देना पड़ा. मतलब चीन, श्रीलंका के बंदरगाह का जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल कर सकता है. उस पर श्रीलंका का कोई अधिकार नहीं रह गया.

अपना सबकुछ गंवा कर श्रीलंका को अब होश आया है और उसने माना है कि हंबनटोटा का बंदरगाह चीन को सौंपना उसकी सबसे बड़ी गलती थी. एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में श्रीलंका के विदेश सचिव जयनाथ कोलंबगे ने कहा कि श्रीलंका अपनी विदेश नीति को तटस्थ रखना चाहता है लेकिन अपनी ‘इंडिया फर्स्ट’ पॉलिसी को छोड़ने वाला नहीं है. हम भारत के लिए सुरक्षा का खतरा नहीं हो सकते और हमको होना भी नहीं है. हमें भारत से फायदा लेना है.’

हंबनटोटा बंदरगाह के बारे में उन्होंने कहा, ‘श्रीलंका ने हबंनटोटा की पेशकश पहले भारत को की थी. भारत ने जिस भी कारण से उसे नहीं लिया और तब वह एक चीनी कंपनी को गया. अब हमने हंबनटोटा बंदरगाह की 85 प्रतिशत हिस्सेदारी चाइना मर्चेंट होल्डिंग कंपनी को दे दी है. हम उमीद करते हैं कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल सिर्फ व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए होगा. यह सैन्य उद्देश्यों के लिए बिल्कुल भी नहीं है.’ उन्होंने कहा, ‘श्रीलंका यह स्वीकार नहीं कर सकता कि उसका इस्तेमाल किसी अन्य देश-विशेष तौर पर भारत के खिलाफ कुछ करने के लिए किया जाए. ना श्रीलंका कभी ऐसा होने देगा.’ उन्होंने कहा श्रीलंका के लिए भारत हमेशा से सबसे अहम था औ हमेशा सबसे अहम रहेगा.’

आपको बता दें कि महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका और चीन के बीच नजदीकियां खूब बढ़ी और विकास के नाम पार श्रीलंका ने चीन से अंधाधुंध कर्ज लिया. लेकिन उसपर कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया कि वो इसे चुका नहीं पाया और अंत में श्रीलंका को अपना हंबनटोटा पोर्ट और 15,000 एकड़ जगह एक इंडस्ट्रियल जोन के लिए चीन को सौंपना पड़ा. श्रीलंका अब इस पोर्ट को चेन से वापस पाना चाहता है.

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