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सामने आई एक नयी जानकारी

बेंगलुरु में 61 साल के एक को”विड 19 से सं”क्रमित   व्यक्ति के नि-‘धन  के बाद हुए उसके श”व के PM  के बाद इस वा-”यरस को लेकर नई जानकारी सामने आई है। बेंगलुरु में पहली बार किसी को-‘रोना मरीज के श-‘/व का PM किया गया है। जिस में ये बात सामने आई है कि शख्स की मौ-”त के बाद ये म”हामा’री  उसके चमड़े पर नहीं बल्कि नाक, मुंह और गले में मौजूद था।

डेक्कीकन हेराल्ड  एक रिपोर्ट के अनुसार ये ऑटोप्सी ऑक्सपोर्ड मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक मेडिसिन के हेड ऑफ डिपार्टमेंट डॉक्टर दिनेश राव द्वारा किया गया।ये ऑटोप्सी को-‘रोना मरीज की मौ-”त के 16 से 18 घंटे बाद किया गया। इस ऑटोप्सी के जरिए ये पता करने की कोशिश की गई कि मौ-त के बाद इंसान के शरीर में कितनी देर तक कोरोना वायरस सक्रिय रहता है और फिर इसमें दूसरे लोगों तक फैलने की कितनी क्षमता होती है।

पांच स्वैब, पांच अलग-अलग नतीजे

रिपोर्ट के अनुसार मृतक के शरीर के अलग-अलग हिस्सों से पांच स्वैब लिए गए थे और इन सभी के नतीजे भी बेहद अलग-अलग आए। एक स्वैब जहां नाक से लिया गया था वहीं अन्य मुंह, गला, फेफरे की सतह, रेस्पायरेट्री पैसेज और चमड़े की सतह (मुंह और गर्दन) से लिए गए। डॉ राव के अनुसार, ‘परीक्षण के बाद मेरे लिए हैरान करने वाली बात ये रही कि वायरस अभी भी नाक, मुंह और गले में मौजूद था।’

बता दें कि कोविड के मामले सामने आने के बाद से ही कई लोग कोरोना पीड़ितों का शव अपने क्षेत्र में लोग दफनाने या जलाने से भी इनकार कर रहे हैं। इस बारे में पूछे जाने पर डॉ. राव ने कहा कि वैज्ञानिक डाटा के अनुसार नए नियमों को बनाने की जरूरत है।

डॉ. राव ने कहा, ‘ये अब बहुत जरूरी है कि हम उसे फॉलो करना बंद करें जो आईसीएमआर और WHO इस बारे में कह रहे हैं। हमें अपना शोध करने की जरूरत है। आईसीएमआर की नीति कहती है कि हमें शव को नहीं छूना चाहिए। लेकिन जब पूछा जाता है कि क्यों, तो वे कहते हैं कि WHO ऐसा कहता है इसलिए। उन्हें ऐसे शोध करने से कौन रोक रहा है। मेरी स्टडी बताती है कि चेहरे और गर्दन पर कोई वायरस नहीं था, फिर हम शरीर क्यों नहीं छू सकते?’

नी देर तक  कोरोना वायरस  सक्रिय रहता है और फिर इसमें दूसरे लोगों तक फैलने की कितनी क्षमता होती है।

पांच स्वैब, पांच अलग-अलग नतीजे

रिपोर्ट के अनुसार मृतक के शरीर के अलग-अलग हिस्सों से पांच स्वैब लिए गए थे और इन सभी के नतीजे भी बेहद अलग-अलग आए। एक स्वैब जहां नाक से लिया गया था वहीं अन्य मुंह, गला, फेफरे की सतह, रेस्पायरेट्री पैसेज और चमड़े की सतह (मुंह और गर्दन) से लिए गए।

डॉ राव के अनुसार, ‘परीक्षण के बाद मेरे लिए हैरान करने वाली बात ये रही कि वायरस अभी भी नाक, मुंह और गले में मौजूद था।’

ड़ॉ राव ने इस बात पर भी जोर दिया कि ये पता लगाया जाना चाहिए कि वायरस कब तक रहता है और इसी के हिसाब से नीति बनाए जाने चाहिए।

इस ऑटोप्सी के बाद ये बात भी सामने आई है कि कोरोना वायरस फेफड़ों का कैसा हाल कर देता है। डॉक्टर राव के अनुसार जिस शख्स की ऑटोप्सी की गई उसका फेफड़े किसी ‘लैदर की बॉल’ की तरह सख्त हो चुके थे। फेफड़ों में हवा भरने वाला हिस्सा खराब हो चुका था और कोशिकाओं में खून के थक्के बन चुके थे।

 

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