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रूस के बाद ईरान ने भी दिया भारत को सस्ते तेल का ऑफर,इस रेट पर मिलेगा तेल

मित्रों इस दुनिया में कई ऐसे देश है जो एक दुसरे से साथ आयात-निर्यात करते है पहले की जब सरकारे थी तब भारत देश उन देशों के बराबर नहीं था पर जब से मौजूदा सरकार आई है तब से  दुनिया में भारत एक अनोखा देश बन गया है .ऐसे कई देश है जहां भारत की गिनती टॉप देशों में की जाती है .ऐसे में भारत अन्य देशो के साथ व्यापार करता और काफी अच्छे से तालमेल बनाये हुए है. इस तरह ईरान ने भारत से की बड़ी अपील की है अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भी भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया, बल्कि पिछले 6 महीने में रूस भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल बेचने वाला देश बन चुका है और अब ईरान ने भी भारत सरकार से रूसी मॉडल के सहारे ही चलने की अपील की है। ईरान ने भारत सरकार से अपील करते हुए ईरान पर लगाए गये एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए उसी तरह से ईरानी तेल खरीदने का आग्रह किया है, जैसे भारत रूस से तेल खरीदता है। उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन एससीओ के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने व्यक्तिगत बैठक के दौरान ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने इस मुद्दे को उठाने वाले हैं और भारत सरकार से अपील करने वाले हैं, कि वो ईरान से तेल खरीदना फिर से शुरू कर दे इस खबर के बारे में विस्तार से जानने के लिए पोस्ट के अंत तक बने रहिये

‘रूस के मॉडल को फॉलो करिए, हमसे तेल खरीदना शुरू कीजिए’, ईरान ने भारत से की बड़ी अपील

दरअसल भारत के लिए ईरान से तेल खरीदना हमेशा से फायदे का सौदा रहा है और अमेरिकी प्रतिबंध से पहले भारत अपनी तेल आयात का बड़ा हिस्सा ईरान से ही खरीदता था, जो भारत को सस्ता तो पड़ता ही था, उसके साथ ही भारत और ईरान के संबंध भी हमेशा से काफी मधुर रहे हैं। लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप शासन के प्रतिबंध के बाद भारत को ईरान से तेल का आयात बंद करना पड़ा था। एससीओ शिखर सम्मेलन 15 और 16 सितंबर को होने वाला है, जिसमें पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति रायसी की व्यक्तिगत बैठक होने वाली है। इस शिखर सम्मेलन में सभी मध्य एशियाई नेताओं के अलावा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी शामिल होंगे। हालांकि, अभी तक इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है, कि क्या पीएम मोदी की शी जिनपिंग और शहबाज शरीफ से मुलाकात होगी या नहीं। इससे पहले डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद भारत ने मई 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया है। यह एक अभूतपूर्व कदम था। प्रतिबंध लगाए जाने से पहले, भारत चीन के बाद ईरानी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार था।

मिली जानकारी के मुताबिक भारत सरकार के अधिकारियों के अनुसार, भारत को यह कदम उस समय अमेरिका के दबाव के कारण उठाना पड़ा था, क्योंकि वाशिंगटन ने ईरान पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए थे, क्योंकि, ट्रम्प प्रशासन ईरान के साथ परमाणु समझौते से बाहर हो गया था, जिसे जेसीपीओए के रूप में भी जाना जाता है। हालाँकि, जब यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और सहयोगी देशों ने रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाए, तो भारत ने अपना स्टैंड नहीं बदला और अमेरिकी चेतावनियों के बाद भी भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा है, जबकि अमेरिका ने रूस के खिलाफ ईरान से भी ज्यादा सख्त प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन, भारत ने बाइडेन प्रशासन की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए रूस से तेल की खरीददारी 50 गुना तक बढ़ा दी है और अब रूस इराक के बाद भारत को तेल बेचने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध “एकतरफा” हैं और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले नहीं हैं, फिर भी भारत ने उस देश से तेल खरीदना बंद कर दिया। लेकिन, अब जबकि भारत ने रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों से बचने के लिए एक तंत्र तैयार कर लिया है, तो फिर नई दिल्ली को तेहरान के लिए भी उसी नीति का पालन करना चाहिए। इस मामले पर कथित तौर पर तब चर्चा हुई, जब भारत में ईरान के निवर्तमान राजदूत अली चेगेनी ने पिछले हफ्ते भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की थी।

आपको बता दें कि इस दौरान ईरान से तेल आयात की बहाली से संबंधित मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई थी, जब जून 2022 में ईरानी विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन भारत के दौरे पर आए थे और एस. जयशंकर से मुलाकात के बाद जब उन्होंने पीएम मोदी से मुलाकात की थी। वहीं, इसी साल जून में एक यूरोपीय थिंक टैंक को अपने एक संबोधन के दौरान, जयशंकर ने ईरानी तेल पर प्रतिबंध नहीं हटाने के लिए अमेरिका से सवाल किया था। आपको बता दें कि, पिछले साल जून में इब्राहिम रायसी ईरान के राष्ट्रपति चुने गये थे और उनसे मुलाकात करने वाले शुरूआती विदेश मंत्रियों में एस. जयशंकर भी शामिल थे। तेल के अलावा, पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान ईरान के राष्ट्रपति चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत की धीमी प्रगति का मुद्दा भी उठा सकता हैं। खासकर, चाबहार-जाहेदान रेलवे परियोजना के अंतिम चरण के निर्माण पर बातचीत होने की उम्मीद है, जो लगभग 200 किमी का है। एक बार अगर ये प्रोजेक्ट पूरा हो जाता है, तो फिर इस रेलमार्ग से ईरान में चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया भारत एक तेज संपर्क स्थापित कर सकता है। इससे चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान तक सड़क मार्ग से मौजूदा संपर्क को भी मजबूत करने की उम्मीद है। ईरान के राष्ट्रपति रायसी और पीएम मोदी के बीच बैठक के दौरान, दोनों पक्षों के बंदरगाह पर शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल के दीर्घकालिक संचालन पर एक समझौते को अंतिम रूप देने की भी उम्मीद है। इस अनुबंध पर हस्ताक्षर करने पर कई वर्षों से चर्चा चल रही है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच विवाद होने की स्थिति में यह मध्यस्थता के मुद्दे पर अटका हुआ है।

अधिकारियों ने कहा कि, ईरानी संविधान में कहा गया है कि विवाद समाधान को किसी भी अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं ले जाया जा सकता है और इसे केवल ईरानी अदालतों में ही लाया जा सकता है। इसलिए, दोनों पक्ष अब इसे हल करने के तरीकों पर चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि ईरानी कानूनों के तहत संविधान में संशोधन असंभव है। इसी साल अगस्त में, बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने शाहिद बेहेस्ती टर्मिनल की प्रगति की समीक्षा करने के लिए ईरान का दौरा किया था, जहां इस मुद्दे पर बंदरगाहों और समुद्री संगठन के उप मंत्री और प्रबंध निदेशक अली अकबर सफी के साथ चर्चा की गई थी। पिछले महीने अपनी यात्रा के दौरान, सोनोवाल ने बंदरगाह पर भारतीय बंदरगाहों वैश्विक चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र आईपीजीसीएफटीजेड को छह मोबाइल हार्बर क्रेन भी सौंपे थे। दोनों पक्षों ने बंदरगाह के सुचारू संचालन के लिए एक संयुक्त तकनीकी समिति बनाने का भी फैसला किया था। वहीं, इस साल फरवरी में, विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने संसद को बताया था कि, भारत 2016 में भारत और ईरान के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के अनुसार रेलवे परियोजना के लिए उत्सुक है।

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